Thursday, October 16, 2014

ऋषि कहते हैं भोग में दुःख है, फिर भी हम भोग में सुख लेते हैं तो स्पस्ट है की ऋषि व हमारी बात में टकराव हो रहा है । ऐसे में अपनी धारणा को छोड़कर ऋषि की बात ही माननी होगी, अन्यथा योग में सफलता नहीं मिल सकती ।

ऋषि कहते हैं भोग में दुःख है, फिर भी हम भोग में सुख लेते हैं तो स्पस्ट है की ऋषि व हमारी बात में टकराव हो रहा है । ऐसे में अपनी धारणा को छोड़कर ऋषि की बात ही माननी होगी, अन्यथा योग में सफलता नहीं मिल सकती । 

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वानप्रस्थ साधक आश्रम 
आर्यवन, रोजड
पो.-सागपुर, जिला - साबरकांठा
गुजरात, पिन - ३८३ ३०७
दूरभाष ९१-०२७७०-२८७४१७, २९१५५५, ९४२७०५९५५0
अन्तर्जाल पर जानकारी हेतु www.vaanaprastharojad.org

- मनमानी बात मानना मानव धर्म नहीं है । प्रमाणों से सिद्ध बात को मानना ही धर्म है । यही सत्यासत्य के ग्रहण-त्याग का अर्थ है । - मन की चंचलता रूकने पर सत्य-असत्य, कर्तव्य-अकर्तव्य, न्याय-अन्याय ठीक-ठीक दिखते हैं ।

- मनमानी बात मानना मानव धर्म नहीं है । प्रमाणों से सिद्ध बात को मानना ही धर्म है । यही सत्यासत्य के ग्रहण-त्याग का अर्थ है ।


- मन की चंचलता रूकने पर सत्य-असत्य, कर्तव्य-अकर्तव्य, न्याय-अन्याय ठीक-ठीक दिखते हैं । 

वानप्रस्थ साधक आश्रम 
आर्यवन, रोजड
पो.-सागपुर, जिला - साबरकांठा
गुजरात, पिन - ३८३ ३०७
दूरभाष ९१-०२७७०-२८७४१७, २९१५५५, ९४२७०५९५५0

अपने मन में एक मूल भावना सदा बनाये रखें "मुझे केवल सत्य की चाह है, मैं सत्य को ही ग्रहण करूँगा" इससे व्यक्ति अटल रहता है, कभी डगमगाता नहीं है । ऐसा व्यक्ति हमेशा जीतेगा । परन्तु जो व्यक्ति सत्य न चाहकर सुख चाहता है, अपने को जो अच्छा लगे उसे ही चाहता है, भले ही वह असत्य/अधर्म/अन्याय क्यों न हो, ऐसा व्यक्ति योग में हमेशा असफल होगा ।

पूज्य स्वामी सत्यपति जी परिव्राजक
(वानप्रस्थ साधक आश्रम, रोजड) 

- अपने मन में एक मूल भावना सदा बनाये रखें "मुझे केवल सत्य की चाह है, मैं सत्य को ही ग्रहण करूँगा" इससे व्यक्ति अटल रहता है, कभी डगमगाता नहीं है । ऐसा व्यक्ति हमेशा जीतेगा । परन्तु जो व्यक्ति सत्य न चाहकर सुख चाहता है, अपने को जो अच्छा लगे उसे ही चाहता है, भले ही वह असत्य/अधर्म/अन्याय क्यों न हो, ऐसा व्यक्ति योग में हमेशा असफल होगा । 

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वानप्रस्थ साधक आश्रम 
आर्यवन, रोजड
पो.-सागपुर, जिला - साबरकांठा
गुजरात, पिन - ३८३ ३०७

Tuesday, September 23, 2014

पढ़े-सुने विषयों को जबतक अनुभूति का विषय नहीं बनाते तबतक प्रगति नहीं होगी । -गौण-मुख्य को जो सही व निर्धारित नहीं कर सकता, वह विफल होगा । - अति आशा में, दृढ़ विश्वास में अभिमान न आये, यह ध्यान रखें । अभिमान से बचने के लिए ईश्वरार्पण करें, सब सामर्थ्य ईश्वर प्रदत्त मानें ।

समादरणीय श्री,
            सादर नमस्ते जी ! 
        वर्तमान में पूज्य स्वामी सत्यपति जी वानप्रस्थ साधक आश्रम में स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं । आपका स्वास्थ्य वर्तमान में अच्छा है । आप समय समय पर यज्ञोपरान्त प्रवचन भी देते हैं तथा आश्रम में आनेवाले सभी महानुभावों को प्रेरणा व आशीर्वाद प्रदान करते रहते हैं । उनके कुछ प्रेरक वाक्य आपकी आध्यात्मिक प्रेरणा हेतु प्रेषित कर रहे हैं । 
- ज्ञानेश्वरार्य: 

दिनांक : २४ / ०९ / २०१४

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पूज्य स्वामी सत्यपति जी परिव्राजक
(वानप्रस्थ साधक आश्रम, रोजड) 

- पढ़े-सुने विषयों को जबतक अनुभूति का विषय नहीं बनाते तबतक प्रगति नहीं होगी ।
-गौण-मुख्य को जो सही व निर्धारित नहीं कर सकता, वह विफल होगा ।
- अति आशा में, दृढ़ विश्वास में अभिमान न आये, यह ध्यान रखें । अभिमान से बचने के लिए ईश्वरार्पण करें, सब सामर्थ्य ईश्वर प्रदत्त मानें । 

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वानप्रस्थ साधक आश्रम 
आर्यवन, रोजड
पो.-सागपुर, जिला - साबरकांठा
गुजरात, पिन - ३८३ ३०७

दोषी व्यक्ति जब अपने दोषों का समर्थन भी करने लगता है, तो वह और अधिक पक्षपाती, हठी और दुराग्रही बन जाता है । - कम योग्यता के समय सम्मान की इच्छा थोड़ी भी अवशिष्ट रही है तो अधिक योग्यता प्राप्त होने पर वह बहुत तीव्रता से बढ़ सकती है ।

समादरणीय श्री,
            सादर नमस्ते जी ! 
        वर्तमान में पूज्य स्वामी सत्यपति जी वानप्रस्थ साधक आश्रम में स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं । आपका स्वास्थ्य वर्तमान में अच्छा है । आप समय समय पर यज्ञोपरान्त प्रवचन भी देते हैं तथा आश्रम में आनेवाले सभी महानुभावों को प्रेरणा व आशीर्वाद प्रदान करते रहते हैं । उनके कुछ प्रेरक वाक्य आपकी आध्यात्मिक प्रेरणा हेतु प्रेषित कर रहे हैं । 
- ज्ञानेश्वरार्य: 

दिनांक : २३ / ०९ / २०१४

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पूज्य स्वामी सत्यपति जी परिव्राजक
(वानप्रस्थ साधक आश्रम, रोजड) 

- दोषी व्यक्ति जब अपने दोषों का समर्थन भी करने लगता है, तो वह और अधिक पक्षपाती, हठी और दुराग्रही बन जाता है ।
- कम योग्यता के समय सम्मान की इच्छा थोड़ी भी अवशिष्ट रही है तो अधिक योग्यता प्राप्त होने पर वह बहुत तीव्रता से बढ़ सकती है । 

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वानप्रस्थ साधक आश्रम 
आर्यवन, रोजड
पो.-सागपुर, जिला - साबरकांठा
गुजरात, पिन - ३८३ ३०७

कई बार व्यक्ति यह सोचता है कि वैदिक योग मार्ग जान समझकर तथा वैज्ञानिकों की बात भी जान समझकर, मैं योग की कोई नई सरल विधि निकलूंगा जिसके द्वारा शीघ्र व सरलता से चरम लक्ष्य प्राप्त हो सकेगा । यह उसका भ्रम है, क्योंकि ऋषियों द्वारा बताया गया वैदिक योग मार्ग सबसे सरल व अन्तिम है, उसमें कोई संशोधन करना योग के विधान में जटिलता पैदा करेगा, दूसरे शब्दों में यह योग के विपरीत चलना होगा ।

समादरणीय श्री,
            सादर नमस्ते जी ! 
        वर्तमान में पूज्य स्वामी सत्यपति जी वानप्रस्थ साधक आश्रम में स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं । आपका स्वास्थ्य वर्तमान में अच्छा है । आप समय समय पर यज्ञोपरान्त प्रवचन भी देते हैं तथा आश्रम में आनेवाले सभी महानुभावों को प्रेरणा व आशीर्वाद प्रदान करते रहते हैं । उनके कुछ प्रेरक वाक्य आपकी आध्यात्मिक प्रेरणा हेतु प्रेषित कर रहे हैं । 
- ज्ञानेश्वरार्य: 

दिनांक : २२ / ०९ / २०१४

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पूज्य स्वामी सत्यपति जी परिव्राजक
(वानप्रस्थ साधक आश्रम, रोजड) 

कई बार व्यक्ति यह सोचता है कि वैदिक योग मार्ग जान समझकर तथा वैज्ञानिकों की बात भी जान समझकर, मैं योग की कोई नई सरल विधि निकलूंगा जिसके द्वारा शीघ्र व सरलता से चरम लक्ष्य प्राप्त हो सकेगा । यह उसका भ्रम है, क्योंकि ऋषियों द्वारा बताया गया वैदिक योग मार्ग सबसे सरल व अन्तिम है, उसमें कोई संशोधन करना योग के विधान में जटिलता पैदा करेगा, दूसरे शब्दों में यह योग के विपरीत चलना होगा ।  

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वानप्रस्थ साधक आश्रम 
आर्यवन, रोजड
पो.-सागपुर, जिला - साबरकांठा
गुजरात, पिन - ३८३ ३०७